लेखक की विनम्र टिप्पणी: मैं चिकित्सक-विज्ञानी तथा संस्कृत, वेदान्त और भारतीय ज्ञान-परम्पराओं का विद्यार्थी हूँ; कोई धार्मिक गुरु अथवा आचार्य नहीं। यह लेख श्रद्धापूर्वक अध्ययन और व्याख्या है, हिन्दू सिद्धान्त पर अन्तिम निर्णय नहीं। विद्वानों, परम्परागत आचार्यों, साधकों और पाठकों के सुधार सादर आमन्त्रित हैं।

भज गोविन्दं भज गोविन्दं
गोविन्दं भज मूढमते ।

आदि शङ्कराचार्य से परम्परागत रूप से सम्बद्ध इन प्रसिद्ध शब्दों से एक सरल किन्तु गहरा प्रश्न उठता है: गोविन्द ही क्यों?

क्या उनका अर्थ था कि केवल गोविन्द—श्रीकृष्ण अथवा विष्णु—की ही उपासना की जाए? यदि अद्वैत का परम विषय ब्रह्म है, तो भज शिवम् क्यों नहीं? देवी क्यों नहीं? और यदि परम सत्य एक है, तो सनातन धर्म में ईश्वर के इतने रूप क्यों हैं?

भज गोविन्दम् को ऋग्वेद के पुरुषसूक्त तथा भगवद्गीता के दशम और एकादश अध्याय के साथ पढ़ने पर एक आध्यात्मिक क्रम दिखाई देता है:

पुरुष — सर्वव्यापक परम सत्ता
विश्वरूप — उस सत्ता की अकल्पनीय विराटता
गोविन्द — वही अनन्त सत्ता जो मानव-हृदय के लिए सुलभ और प्रेममय है

इससे गोविन्द, शिव या देवी “केवल प्रतीक” नहीं बन जाते। यह हमें समझाता है कि अनन्त परमात्मा निकट, पवित्र और उपास्य स्वरूपों द्वारा कैसे अनुभव किए जा सकते हैं।

ब्रह्म किससे बना है?

यह प्रश्न पूर्णतः उपयुक्त नहीं। जो किसी अन्य पदार्थ से बना हो, वह उस पदार्थ पर निर्भर होगा। वेदान्त में ब्रह्म कोई निर्मित वस्तु नहीं। अधिक गहरा प्रश्न है: परम सत्य में क्या समाहित है, और क्या कुछ उससे पूर्णतः बाहर है?

सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् ।
स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ॥

ऋग्वेद १०.९०.१

विराट पुरुष के “हजार सिर, हजार आँखें और हजार चरण” हैं। यहाँ “सहस्र” को अंक १००० तक सीमित समझना आवश्यक नहीं; भाव असंख्य और अपरिमेय का है।

पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम् ।
उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥

ऋग्वेद १०.९०.२

जो हो चुका है और जो आगे होगा—यह सब पुरुष ही है। भूत, वर्तमान, भविष्य, जीवन, प्रकृति और जगत् उसी विराट वास्तविकता में अन्तर्भूत हैं।

एतावानस्य महिमातो ज्यायांश्च पूरुषः ।
पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥

ऋग्वेद १०.९०.३

दृश्य जगत् उसकी महिमा का केवल एक अंश है; पुरुष प्रकट जगत् से भी महान् हैं। परमात्मा सृष्टि में व्याप्त हैं और उससे परे भी।

सब कुछ परमात्मा में है, किन्तु परमात्मा केवल उतने नहीं हैं जितना हमें दिखाई देता है।
पुरुषसूक्त से प्रेरित विराट पुरुष की वैचारिक कलात्मक छवि
पुरुषसूक्त (ऋग्वेद १०.९०) की विराट कल्पना से प्रेरित वैचारिक चित्र। यह ब्रह्म का कोई प्रामाणिक अथवा शास्त्रीय चित्रण नहीं, बल्कि एक व्याख्यात्मक कलाकृति है।

गीता का विभूतियोग: जगत् में ईश्वर को पहचानना

अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ॥

भगवद्गीता १०.२०

“मैं समस्त प्राणियों के अन्तःकरण में स्थित आत्मा हूँ। मैं ही उनका आदि, मध्य और अन्त हूँ।” ईश्वर केवल किसी दूरस्थ लोक में नहीं; जीवन की अन्तरतम गहराई में भी वही दिव्य उपस्थिति है।

यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा ।
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम् ॥

भगवद्गीता १०.४१

जहाँ असाधारण तेज, सौन्दर्य, सामर्थ्य या महिमा दिखे, उसे ईश्वरीय तेज की अभिव्यक्ति समझा जा सकता है।

विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥

भगवद्गीता १०.४२

“मैं अपने एक अंश से इस सम्पूर्ण जगत् को धारण करके स्थित हूँ।” विश्व ईश्वरीय महिमा में स्थित है, किन्तु ईश्वर विश्व से भी अधिक हैं।

अर्जुन उस अनन्त को देखना चाहता है

न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा ।
दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ॥

भगवद्गीता ११.८

“इन सामान्य नेत्रों से तुम मुझे नहीं देख सकते; मैं तुम्हें दिव्य दृष्टि देता हूँ।” बात केवल यह नहीं कि भगवान् दिखाई नहीं देते। परमात्मा की सम्पूर्णता सामान्य मानवीय इन्द्रियों की क्षमता से परे है।

अर्जुन विश्वरूप में सम्पूर्ण चराचर जगत् देखता है। वह न आदि देखता है, न मध्य और न अन्त; कृष्ण को आदिदेव, पुराण पुरुष और अनन्तरूप कहता है जिनसे विश्व व्याप्त है (गीता ११.१३, ११.१६, ११.३८)।

मनुष्य इतने विराट परमात्मा से प्रेम कैसे करे?

हम आकाशगङ्गाओं के स्रोत, काल के आधार और असंख्य प्राणियों के भीतर स्थित सत्ता पर चिन्तन कर सकते हैं। किन्तु बच्चा किसे पुकारे? दुःखी माता किसके सामने रोए? भक्त किस नाम का जप करे? किससे कहे—“रक्षा कीजिए, मार्ग दिखाइए, मैं आपसे प्रेम करता हूँ”?

यहीं सनातन धर्म की आध्यात्मिक करुणा समझ में आती है। अनन्त को हमारे निकट आने के लिए सीमित होने की आवश्यकता नहीं। इसलिए गोविन्द, महादेव, श्रीराम, श्रीकृष्ण, नारायण, माँ दुर्गा, काली, लक्ष्मी, सरस्वती, गणपति, सूर्यनारायण, स्कन्द और अनेक अवतार तथा उपास्य स्वरूप हैं।

इन्हें मानव-कल्पना मात्र कहना हिन्दू भक्ति के साथ न्याय नहीं होगा। अपनी-अपनी परम्पराओं में ये ईश्वर के वास्तविक, पवित्र और उपास्य स्वरूप हैं। अनन्त परमात्मा सुलभ होते हैं—बिना अनन्त होना छोड़े।

अवतार: ईश्वर की सीमा नहीं, उनकी कृपा

अर्जुन के सामने कृष्ण बोलते हैं, मित्र की तरह समझाते हैं और सारथि बनते हैं। पर वही कृष्ण विश्वरूप प्रकट करते हैं तो अर्जुन सामान्य नेत्रों से उसे देख भी नहीं सकता।

ईश्वर किसी सुलभ रूप में प्रकट होकर उस रूप तक सीमित नहीं हो जाते।

यशोदा बालक कृष्ण को गोद में उठा सकती हैं; अर्जुन उन्हीं कृष्ण का विश्वरूप देखकर काँपता है। ये दिव्यता के दो आयाम हैं: माधुर्य—प्रेम, निकटता और सौन्दर्य; तथा ऐश्वर्य—विराटता, शक्ति और अनन्तता।

विश्वरूप बताता है कि ईश्वर कितने विराट हैं। गोविन्द बताते हैं कि वही विराट ईश्वर प्रेम करने योग्य और निकट भी हैं।

अब “भज गोविन्दम्” पर लौटिए

शङ्कराचार्य साधारण साधक से आरम्भ में यह नहीं कहते कि पहले ही क्षण सभी नाम-रूपों से परे निरपेक्ष सत्ता का चिन्तन करो। वे कहते हैं: भज गोविन्दम्—गोविन्द का भजन, स्मरण और प्रेम करो।

मनुष्य गोविन्द से सम्बन्ध बना सकता है, उनका नाम जप सकता है, लीला सुन सकता है, पुष्प और भोजन अर्पित कर सकता है और अपना दुःख उनके सामने रख सकता है। भक्ति से मन स्थिर, अहंकार नम्र, कामनाएँ संयत और चित्त शुद्ध होता है। साधक तब गहरे आत्मविचार के योग्य बनता है।

भज गोविन्दम् आगे परब्रह्म, ब्रह्मपद, कोऽहम्? तथा सबमें आत्मा को देखने और भेद-अज्ञान त्यागने की शिक्षा देता है। ग्रन्थ के प्रचलित संस्करणों में पद्यक्रम और कुछ अतिरिक्त श्लोक भिन्न मिलते हैं।

मोह → भक्ति → चित्तशुद्धि → वैराग्य → विवेक → आत्मविचार → ज्ञान → मोक्ष

क्या शङ्कराचार्य “भज शिवम्” भी कह सकते थे?

अद्वैत की साधना-दृष्टि में शिव, देवी तथा ईश्वर के अन्य शास्त्रसम्मत स्वरूपों की उपासना वास्तविक उपासना हो सकती है। किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि भज गोविन्दम् में गोविन्द का महत्त्व नहीं। ग्रन्थ गोविन्द का स्मरण कराता है और मुरारि, विष्णु तथा श्रीपति जैसे नाम लेता है। उसके वैष्णव भक्तिभाव का सम्मान आवश्यक है।

उसी प्रकार शिवस्तोत्र को शिवस्तोत्र और देवीस्तोत्र को देवीस्तोत्र रहने दीजिए। एकत्व का अर्थ विविधता को मिटा देना नहीं है। वैष्णव, शैव और शाक्त अपने इष्ट को सर्वस्व मान सकते हैं। समस्या तब होती है जब अपने इष्ट के प्रति अनन्य प्रेम दूसरे के इष्ट के प्रति तिरस्कार बन जाए।

एक परम सत्य — अनेक द्वार

पुरुषसूक्त बताता है कि जगत् विराट सत्ता में है और वह सत्ता जगत् से भी अधिक है। विभूतियोग दिखाता है कि ईश्वर की महिमा सृष्टि में अनेक प्रकार से झलकती है। विश्वरूप बताता है कि पूर्ण विराटता सामान्य दृष्टि से परे है। भक्ति उसी अनन्त के साथ व्यक्तिगत सम्बन्ध देती है।

जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड से भी महान् है, वही मानव-हृदय के अत्यन्त निकट भी हो सकता है।

पुरुषसूक्त से विश्वरूप, और विश्वरूप से गोविन्द तक

पुरुषसूक्त
समस्त भूत, भविष्य और जगत् विराट पुरुष में हैं; पुरुष दृश्य जगत् से भी परे हैं।
↓
भगवद्गीता — अध्याय १०
दिव्य सत्ता प्राणियों में स्थित है और महान् विभूतियों में अपना तेज प्रकट करती है।
↓
भगवद्गीता — अध्याय ११
अर्जुन विश्वरूप में सम्पूर्ण जगत् देखता है—ऐसी विराटता जिसे सामान्य आँखें नहीं देख सकतीं।
↓
भक्ति
वही असीम सत्ता गोविन्द, शिव, देवी, राम तथा अन्य उपास्य स्वरूपों में प्रेमपूर्वक सुलभ होती है।
↓
वेदान्त
भक्ति, चित्तशुद्धि, विवेक और आत्मविचार से साधक उस सत्य की ओर बढ़ता है जो कभी उससे दूर था ही नहीं।

तब “भज गोविन्दम्” का अर्थ क्या है?

अर्थ वही है जो शब्द कहते हैं: गोविन्द का भजन करो। इसका अर्थ यह नहीं कि दूसरे सभी मार्गों से घृणा करो। पूरा जीवन धन-संग्रह में मत खोओ; यौवन को शाश्वत, विषय-सुख को परम आनन्द, विद्वत्ता को आत्मज्ञान या धार्मिक बाह्यरूप को अनुभूति मत समझो। भगवान् को स्मरण करो। प्रेम करो। समर्पण करो। सत्य खोजो। पूछो—मैं कौन हूँ? केवल मन्दिर में नहीं, सम्पूर्ण अस्तित्व में ईश्वर की उपस्थिति देखने का प्रयास करो।

पुरुषसूक्त बताता है कि परमात्मा कितने विराट हैं। विश्वरूप दिखाता है कि वह विराटता सामान्य दृष्टि के लिए कितनी असह्य हो सकती है। गोविन्द बताते हैं कि वही अनन्त परमात्मा प्रेम के योग्य भी हैं।

भज गोविन्दम्।

सम्बन्धित IVYPANDIT व्याख्यान

पुरुषसूक्त, गीता अध्याय १०–११ और ब्रह्माण्ड की वैदिक दृष्टि

विराट पुरुष, विभूतियोग और विश्वरूप-दर्शन पर सहायक व्याख्यान।

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स्रोत और आगे का अध्ययन

  1. ऋग्वेद १०.९०, पुरुषसूक्त। वैदिक हेरिटेज पोर्टल →
  2. भगवद्गीता, अध्याय १० और ११।
  3. भज गोविन्दम्, परम्परागत रूप से आदि शङ्कराचार्य से सम्बद्ध; प्रचलित संस्करणों में कुछ भिन्नताएँ हैं।
  4. Jamison, S. W., and Brereton, J. P. The Rigveda: The Earliest Religious Poetry of India. Oxford University Press, 2014.
अन्तिम विनम्र निवेदन: यह लेख पुरुषसूक्त, भगवद्गीता और अद्वैत-उन्मुख भज गोविन्दम् पाठ को साथ पढ़ने का प्रयास है। वैष्णव, शैव, शाक्त, द्वैत, विशिष्टाद्वैत तथा अन्य हिन्दू परम्पराएँ कुछ सम्बन्धों को अलग प्रकार से समझ सकती हैं। मैं इसे धार्मिक प्राधिकारी के रूप में नहीं, विद्यार्थी के रूप में प्रस्तुत करता हूँ। सुधार सादर आमन्त्रित हैं।

परम्परा का सम्मान। जिज्ञासा का स्वागत। सत्य की खोज।